लोक प्रशासन (प्रशासनिक सिद्धांत) [Public Administration] by Dr. B.L.Fadia, & Dr. Kuldeep Fadia
by Dr. B.L.Fadia & Dr. Kuldeep Fadia
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लोक प्रशासन [Public Administration] पुस्तक का 26वां संशोधित संस्करण पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए हमें अत्यन्त हर्ष हो रहा है। प्रस्तुत संस्करण पूर्णतया परिमार्जित और संशोधित है। देश की स्वाधीनता के अनन्तर लोक प्रशासन कानून और व्यवस्था के क्षेत्र तक सीमित न रहकर जनजीवन से सम्बद्ध समस्त गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण हो गया है। विकास के चरण प्रगति की विविध दिशाओं में जिस गति से बढ़ रहे हैं उसी क्रम से नए-नए संगठनों का निर्माण और उनका विधिवत् संचालन प्रशासकों के लिए नित्य नई चुनौती प्रस्तुत कर रहा है। विभिन्न योजनाओं में देश के नागरिकों की बढ़ती हुई अभिरुचि के साथ ही प्रशासक वर्ग का उत्तरदायित्व भी बढ़ता जा रहा है। संक्षेप में, कहा जा सकता है कि लोक प्रशासन आज एक ऐसा महत्वपूर्ण विषय बन गया है कि उसके विविध पक्षों और स्वरूपों के सम्बन्ध में देश के बौद्धिक वर्ग को अधिक-से-अधिक परिचित कराया जाए। पिछले कई वर्षों में हमने यह अनुभव किया है कि ‘लोक प्रशासन’ के ‘सैद्धान्तिक अध्ययन’ के महत्व के प्रति रुचि उत्पन्न कराने के लिए हिन्दी में ठोस सामग्री वाली पुस्तकों की अविलम्ब आवश्यकता है। वैसे ‘लोक प्रशासन’ से सम्बन्धित अनेक पुस्तकें हिन्दी में प्रकाशित हुई हैं। इन सबके होते हुए भी मुझे नई पुस्तक लिखने की धुन क्यों सवार हुई? यह प्रश्न समाधेय है। अद्यावधि विशेषतः हिन्दी प्रणीत पुस्तकों की शैली जटिल तथा विषय-सामग्री दुर्बोध और अस्पष्ट है। कुछ तो एकपक्षीय या परिचयात्मक मात्र हैं जिससे उनमें विषय का विशद् विश्लेषणात्मक विवेचन नहीं हो पाया है। वास्तव में, एम. ए. तथा सिविल सर्विस प्रभृति परीक्षाओं में प्रविष्ट होने वाले अध्येताओं के लिए कतिपय प्रसंगों के विशद् विवेचन के स्थान पर एक ही पुस्तक में प्रायः सभी सहसम्बद्ध प्रसंगों की यथासम्भव अधिकतम जानकारी अभीष्ट होती है। प्रस्तुत पुस्तक का प्रणयन इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए हुआ है। इसमें ‘लोक प्रशासन: सिद्धान्त एवं व्यवहार’ से सम्बन्धित अध्येतव्य आवश्यक समस्त सामग्री एक ही स्थान पर सुलभ कर दी गई है। पुस्तक में जगह-जगह लोक प्रशासन के सिद्धान्त सूत्र को भारत, इंग्लैण्ड, अमरीका और फ्रांस के प्रशासनिक संस्थानों और उनकी कार्यविधियों के तुलनात्मक अध्ययन से जोड़ने का सचेष्ट प्रयास किया गया है। यथासम्भव ‘प्रबन्ध’ के सिद्धान्त और व्यवहार पक्ष को ऐसे प्रस्तुत किया गया है कि पाठक विषय को व्यापक धरातल पर भी रखकर देख सकें। सिविल सर्विस परीक्षा के पाठ्यक्रम को देखते हुए पुस्तक में कतिपय नवीन अध्यायकृविकास की अवधारणा, विकास विरोधी धारणा, विकास प्रशासन, तुलनात्मक लोक प्रशासन, विकसित एवं विकासशील समाजों में लोक प्रशासन की भूमिका, लोक प्रशासन का परिवेश, लोक प्रशासन एवं लोकनीति, लोक विकल्प (लोक चयन) सिद्धान्त, नवीन लोक प्रबन्ध ;छच्डद्धए राज्य बनाम बाजार चर्चा, प्रशासनिक संस्कृति, आलोचनात्मक सिद्धान्त एवं लोकसंगठन, तन्त्र विश्लेषण तकनीकेंकृपर्ट एवं सी. पी. एम., उद्यमी शासन, सुशासन की अवधारणा, सूचना प्रौद्योगिकी एवं लोक प्रशासन, ई-प्रशासन, उदारीकरण, निजीकरण, भूमण्डलीकरण की चुनौतियां एवं लोक प्रशासन, नौकरशाही: आकार में कमी, सिविल समाज की अवधारणा, प्रशासन में जनसहभागिता तथा सूचना का अधिकार, प्रशासनिक नैतिकता, मौद्रिक नीतिकृउद्देश्य एवं साधन, राजकोषीय नीति और उसके उपकरण, सार्वजनिक ऋण एवं शिकायत समाधान तन्त्र भी यथास्थान सम्मिलित कर दिए गए हैं।
Product Overview
लोक प्रशासन [Public Administration] पुस्तक का 26वां संशोधित संस्करण पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए हमें अत्यन्त हर्ष हो रहा है। प्रस्तुत संस्करण पूर्णतया परिमार्जित और संशोधित है। देश की स्वाधीनता के अनन्तर लोक प्रशासन कानून और व्यवस्था के क्षेत्र तक सीमित न रहकर जनजीवन से सम्बद्ध समस्त गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण हो गया है। विकास के चरण प्रगति की विविध दिशाओं में जिस गति से बढ़ रहे हैं उसी क्रम से नए-नए संगठनों का निर्माण और उनका विधिवत् संचालन प्रशासकों के लिए नित्य नई चुनौती प्रस्तुत कर रहा है। विभिन्न योजनाओं में देश के नागरिकों की बढ़ती हुई अभिरुचि के साथ ही प्रशासक वर्ग का उत्तरदायित्व भी बढ़ता जा रहा है। संक्षेप में, कहा जा सकता है कि लोक प्रशासन आज एक ऐसा महत्वपूर्ण विषय बन गया है कि उसके विविध पक्षों और स्वरूपों के सम्बन्ध में देश के बौद्धिक वर्ग को अधिक-से-अधिक परिचित कराया जाए। पिछले कई वर्षों में हमने यह अनुभव किया है कि ‘लोक प्रशासन’ के ‘सैद्धान्तिक अध्ययन’ के महत्व के प्रति रुचि उत्पन्न कराने के लिए हिन्दी में ठोस सामग्री वाली पुस्तकों की अविलम्ब आवश्यकता है। वैसे ‘लोक प्रशासन’ से सम्बन्धित अनेक पुस्तकें हिन्दी में प्रकाशित हुई हैं। इन सबके होते हुए भी मुझे नई पुस्तक लिखने की धुन क्यों सवार हुई? यह प्रश्न समाधेय है। अद्यावधि विशेषतः हिन्दी प्रणीत पुस्तकों की शैली जटिल तथा विषय-सामग्री दुर्बोध और अस्पष्ट है। कुछ तो एकपक्षीय या परिचयात्मक मात्र हैं जिससे उनमें विषय का विशद् विश्लेषणात्मक विवेचन नहीं हो पाया है। वास्तव में, एम. ए. तथा सिविल सर्विस प्रभृति परीक्षाओं में प्रविष्ट होने वाले अध्येताओं के लिए कतिपय प्रसंगों के विशद् विवेचन के स्थान पर एक ही पुस्तक में प्रायः सभी सहसम्बद्ध प्रसंगों की यथासम्भव अधिकतम जानकारी अभीष्ट होती है। प्रस्तुत पुस्तक का प्रणयन इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए हुआ है। इसमें ‘लोक प्रशासन: सिद्धान्त एवं व्यवहार’ से सम्बन्धित अध्येतव्य आवश्यक समस्त सामग्री एक ही स्थान पर सुलभ कर दी गई है। पुस्तक में जगह-जगह लोक प्रशासन के सिद्धान्त सूत्र को भारत, इंग्लैण्ड, अमरीका और फ्रांस के प्रशासनिक संस्थानों और उनकी कार्यविधियों के तुलनात्मक अध्ययन से जोड़ने का सचेष्ट प्रयास किया गया है। यथासम्भव ‘प्रबन्ध’ के सिद्धान्त और व्यवहार पक्ष को ऐसे प्रस्तुत किया गया है कि पाठक विषय को व्यापक धरातल पर भी रखकर देख सकें। सिविल सर्विस परीक्षा के पाठ्यक्रम को देखते हुए पुस्तक में कतिपय नवीन अध्यायकृविकास की अवधारणा, विकास विरोधी धारणा, विकास प्रशासन, तुलनात्मक लोक प्रशासन, विकसित एवं विकासशील समाजों में लोक प्रशासन की भूमिका, लोक प्रशासन का परिवेश, लोक प्रशासन एवं लोकनीति, लोक विकल्प (लोक चयन) सिद्धान्त, नवीन लोक प्रबन्ध ;छच्डद्धए राज्य बनाम बाजार चर्चा, प्रशासनिक संस्कृति, आलोचनात्मक सिद्धान्त एवं लोकसंगठन, तन्त्र विश्लेषण तकनीकेंकृपर्ट एवं सी. पी. एम., उद्यमी शासन, सुशासन की अवधारणा, सूचना प्रौद्योगिकी एवं लोक प्रशासन, ई-प्रशासन, उदारीकरण, निजीकरण, भूमण्डलीकरण की चुनौतियां एवं लोक प्रशासन, नौकरशाही: आकार में कमी, सिविल समाज की अवधारणा, प्रशासन में जनसहभागिता तथा सूचना का अधिकार, प्रशासनिक नैतिकता, मौद्रिक नीतिकृउद्देश्य एवं साधन, राजकोषीय नीति और उसके उपकरण, सार्वजनिक ऋण एवं शिकायत समाधान तन्त्र भी यथास्थान सम्मिलित कर दिए गए हैं।
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